Kabir Ke Dohe in Hindi-संपूर्ण कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में

Kabir Ke Dohe in Hindi-संपूर्ण कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में

Kabir Ke Dohe in Hindi

 

संत कबीर का जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था परंतु फिर भी उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने के लिए जीवन के अंतिम क्षणों तक प्रयत्न किया। संत कबीर समाज में फैले आडंबर और अंधविश्वास को मिटाने के लिए दोहे और पद की रचना करते थे जिनका सीधा उद्देश्य कुरीतियों पर वार करना था।

उनके दोहे और साथिया आज के युग में भी समान तरीके से लाभदायक है। क्योंकि आज भी समाज में बहुत से आडंबर और अंधविश्वास फैले हैं जिन्हें मिटाना बहुत जरूरी है। आपको हमारे लिखे गए इस लेख में ना सिर्फ कबीर के दोहे और साखियां पढ़ने को मिलेंगे बल्कि उनकी संपूर्ण व्याख्या भी प्राप्त होगी।

 

Name Kabir Das / कबीर दास
Born ठीक से ज्ञात नहीं  (1398 या  1440) लहरतारा , निकट वाराणसी
Died ठीक से ज्ञात नहीं  (1448 या 1518) मगहर
Occupation कवि, भक्त, सूत कातकर कपड़ा बनाना
Nationality भारतीय (Indian)

Kabir Ke Dohe in Hindi-संपूर्ण कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में:-

दोहा-1

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि हमारेपास समय बहुतकम है, जोकाम कल करनाहै वो आजकरो, और जोआज करना हैवो अभी करो, क्यूंकि पलभर में प्रलयजो जाएगी फिरआप अपने कामकब करेंगे।

दोहा-2

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं जैसे तिलके अंदर तेलहोता है, औरआग के अंदररौशनी होती हैठीक वैसे हीहमारा ईश्वर हमारेअंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सकोतो ढूढ लो।

दोहा-3

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि जहाँदया है वहीँधर्म है औरजहाँ लोभ हैवहां पाप है, और जहाँ क्रोधहै वहां सर्वनाश हैऔर जहाँ क्षमाहै वहाँ ईश्वरका वास होताहै।

दोहा-4

जो घट प्रेम संचारे, जो घट जान सामान
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण

भावार्थ:- जिसइंसान अंदर दूसरोंके प्रति प्रेमकी भावना नहींहै वो इंसानपशु के समानहै।

दोहा-5

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश
जो है जा को भावना सो ताहि के पास

भावार्थ:- कमलजल में खिलताहै और चन्द्रमा आकाशमें रहता है।लेकिन चन्द्रमा काप्रतिबिम्ब जब जल मेंचमकता है तोकबीर दास जीकहते हैं किकमल और चन्द्रमा मेंइतनी दूरी होनेके बावजूद भीदोनों कितने पासहै। जल मेंचन्द्रमा का प्रतिबिम्ब ऐसालगता है जैसेचन्द्रमा खुद कमल केपास गयाहो। वैसे हीजब कोई इंसानईश्वर से प्रेमकरता है वोईश्वर स्वयं चलकरउसके पास आतेहैं।

दोहा-6

जाती पूछो साधू की, पूछ लीजियेज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान

भावार्थ:- साधुसे उसकी जातिमत पूछो बल्किउनसे ज्ञान कीबातें करिये, उनसेज्ञान लीजिए। मोलकरना है तोतलवार का करोम्यान को पड़ीरहने दो।

दोहा-7

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए

भावार्थ:-अगर आपका मनशीतल है तोदुनियां में कोई आपकादुश्मन नहीं बनसकता

दोहा-8

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई संग
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि अबतक जो समयगुजारा है वोव्यर्थ गया, नाकभी सज्जनों कीसंगति की औरना ही कोईअच्छा काम किया।प्रेम और भक्तिके बिना इंसानपशु के समानहै और भक्तिकरने वाला इंसानके ह्रदय मेंभगवान का वासहोता है।

 

दोहा-9

गुरु गोविंददोउ खड़े, काके लागूं पाँय
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

भावार्थ:- कबीरदास जी इसदोहे में कहतेहैं कि अगरहमारे सामने गुरुऔर भगवान दोनोंएक साथ खड़ेहों तो आपकिसके चरण स्पर्शकरेंगे? गुरु नेअपने ज्ञान सेही हमें भगवानसे मिलने कारास्ता बताया हैइसलिए गुरु कीमहिमा भगवान सेभी ऊपर हैऔर हमें गुरुके चरण स्पर्शकरने चाहिए।

दोहा-10

प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है।
लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।

भावार्थ:- घरदूर है मार्गलंबा है रास्ताभयंकर है औरउसमें अनेक पातकचोर ठग हैं।हे सज्जनों ! कहो, भगवान् का दुर्लभदर्शन कैसे प्राप्त हो?संसार में जीवनकठिन हैअनेकबाधाएं हैं विपत्तियां हैंउनमें पड़कर हमभरमाए रहते हैंबहुत से आकर्षणहमें अपनी ओरखींचते रहते हैंहम अपना लक्ष्यभूलते रहते हैंअपनी पूंजी गंवातेरहते हैं।

दोहा-11

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूंजीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव।

भावार्थ:- इसशरीर को दीपकबना लूं, उसमेंप्राणों की बत्ती डालूँऔर रक्त सेतेल की तरहसींचूंइस तरहदीपक जला करमैं अपने प्रियके मुख कादर्शन कब करपाऊंगा? ईश्वर सेलौ लगाना उसेपाने की चाहकरना उसकी भक्तिमें तन-मनको लगाना एकसाधना है तपस्याहैजिसे कोईकोई विरला हीकर पाता है!

दोहा-12

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को तुझ देखन देऊँ।

भावार्थ:- हेप्रिय ! प्रभु तुमइन दो नेत्रों कीराह से मेरेभीतर जाओऔर फिर मैंअपने इन नेत्रों कोबंद कर लूं! फिर तोमैं किसी दूसरेको देखूं और ही किसीऔर को तुम्हें देखनेदूं !

दोहा-13

कबीर रेख सिन्दूरकी काजल दिया जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई

भावार्थ:- कबीरकहते हैं किजहां सिन्दूर कीरेखा हैवहांकाजल नहीं दियाजा सकता। जबनेत्रों में राम विराजरहे हैं तोवहां कोई अन्यकैसे निवास करसकता है ?

दोहा-14

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस

भावार्थ:- कबीर कहतेहैं कि समुद्रकी सीपी प्यासप्यास रटती रहतीहै। स्वाति नक्षत्र कीबूँद की आशालिए हुए समुद्रकी अपार जलराशिको तिनके केबराबर समझती है।हमारे मन मेंजो पाने कीललक है जिसेपाने की लगनहै, उसके बिनासब निस्सार है।

दोहा-15

सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग

भावार्थ:- कबीरकहते हैं किजिन घरों मेंसप्त स्वर गूंजतेथे, पल पलउत्सव मनाए जातेथे, वे घरभी अब खालीपड़े हैंउनपरकौए बैठने लगेहैं। हमेशा एकसा समय तोनहीं रहता ! जहांखुशियाँ थी वहां गमछा जाता हैजहां हर्ष थावहां विषाद डेराडाल सकता हैयह इस संसारमें होता है!

दोहा-16

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास।

भावार्थ:- कबीरकहते है किऊंचे भवनों कोदेख कर क्यागर्व करते हो? कल या परसोंये ऊंचाइयां औरआप भी धरतीपर लेट जाएंगेध्वस्त हो जाएंगेऔर ऊपर सेघास उगने लगेगी! वीरान सुनसान होजाएगा जो अभीहंसता खिलखिलाता घरआँगन है ! इसलिएकभी गर्व करना चाहिए

दोहा-17

जांमण मरण बिचारिकरि कूड़े काम निबारि
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि

भावार्थ:- जन्म औरमरण का विचारकरके , बुरे कर्मोंको छोड़ दे।जिस मार्ग परतुझे चलना हैउसी मार्ग कास्मरण करउसेही याद रखउसे ही संवारसुन्दर बना।

दोहा-18

बिन रखवालेबाहिरा चिड़िये खाया खेत
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत

भावार्थ:- रखवालेके बिना बाहरसे चिड़ियों नेखेत खा लिया।कुछ खेत अबभी बचा हैयदि सावधान होसकते हो तोहो जाओउसेबचा लो ! जीवनमें असावधानी केकारण इंसान बहुतकुछ गँवा देताहैउसे खबरभी नहीं लगतीनुक्सान हो चुका होताहैयदि हमसावधानी बरतें तो कितनेनुक्सान से बच सकतेहैं ! इसलिए जागरूकहोना है हरइंसान को - जैसेपराली जलाने कीसावधानी बरतते तो दिल्लीमें भयंकर वायुप्रदूषण से बचते परअब पछताए होत

दोहा-19

 क्या जब चिड़िया चुग गई खेत !
कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे दूजी बार

भावार्थ:- कबीरकहते हैं शरीररूपी देवालय नष्टहो गयाउसकीईंट ईंटअर्थातशरीर का अंगअंग - शैवाल अर्थातकाई में बदलगई। इस देवालयको बनाने वालेप्रभु से प्रेमकर जिससे यहदेवालय दूसरी बारनष्ट हो।

दोहा-20

कबीर मंदिर लाख का, जडियांहीरे लालि
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि

भावार्थ:- यहशरीर लाख काबना मंदिर हैजिसमें हीरे औरलाल जड़े हुएहैं।यह चार दिनका खिलौना हैकल ही नष्टहो जाएगा। शरीरनश्वर हैजतनकरके मेहनत करकेउसे सजाते हैंतब उसकी क्षणभंगुरता को भूल जातेहैं किन्तु सत्यतो इतना हीहै कि देहकिसी कच्चे खिलौनेकी तरह टूटफूट जाती हैअचानक ऐसे किहम जान भीनहीं पाते !

दोहा-21

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि यहजो शरीर हैवो विष जहरसे भरा हुआहै और गुरुअमृत की खानहैं। अगर अपनाशीशसर देने केबदले में आपकोकोई सच्चा गुरुमिले तो येसौदा भी बहुतसस्ता है।

दोहा-22

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा जाए

भावार्थ:- अगरमैं इस पूरीधरती के बराबरबड़ा कागज बनाऊंऔर दुनियां केसभी वृक्षों कीकलम बना लूँऔर सातों समुद्रों केबराबर स्याही बनालूँ तो भीगुरु के गुणोंको लिखना संभवनहीं है।

दोहा-23

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि इंसानको ऐसी भाषाबोलनी चाहिए जोसुनने वाले केमन को बहुतअच्छी लगे। ऐसीभाषा दूसरे लोगोंको तो सुखपहुँचाती ही है, इसकेसाथ खुद कोभी बड़े आनंदका अनुभव होताहै।

दोहा-24

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि खजूरका पेड़ बेशकबहुत बड़ा होताहै लेकिन नातो वो किसीको छाया देताहै और फलभी बहुत दूरऊँचाई पेलगता है। इसीतरह अगर आपकिसी का भलानहीं कर पारहे तो ऐसेबड़े होने सेभी कोई फायदानहीं है।

दोहा-25

निंदक नियेरेराखिये, आँगन कुटी छावायें
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि निंदकहमेशा दूसरोंकी बुराइयां करनेवाले लोगों कोहमेशा अपने पासरखना चाहिए, क्यूंकि ऐसेलोग अगर आपकेपास रहेंगे तोआपकी बुराइयाँ आपकोबताते रहेंगे औरआप आसानी सेअपनी गलतियां सुधारसकते हैं। इसीलिएकबीर जी नेकहा है किनिंदक लोग इंसानका स्वभाव शीतलबना देते हैं।

दोहा-26

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिलियाकोय
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा कोय

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि मैंसारा जीवन दूसरोंकी बुराइयां देखनेमें लगा रहालेकिन जब मैंनेखुद अपने मनमें झाँक करदेखा तो पायाकि मुझसे बुराकोई इंसान नहींहै। मैं हीसबसे स्वार्थी औरबुरा हूँ भावार्थात हमलोग दूसरों कीबुराइयां बहुत देखते हैंलेकिन अगर आपखुद के अंदरझाँक कर देखेंतो पाएंगे किहमसे बुरा कोईइंसान नहीं है।

दोहा-27

दुःख में सुमिरनसब करे, सुख में करे कोय
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय

भावार्थ:- दुःखमें हर इंसानईश्वर को यादकरता है लेकिनसुख में सबईश्वर को भूलजाते हैं। अगरसुख में भीईश्वर को यादकरो तो दुःखकभी आएगा हीनहीं।

दोहा-28

माटी कहे कुमारसे, तू क्या रोंदे मोहे
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे

भावार्थ:- जबकुम्हार बर्तन बनाने केलिए मिटटी कोरौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार सेकहती हैतूमुझे रौंद रहाहै, एक दिनऐसा आएगा जबतू इसी मिटटीमें विलीन होजायेगा और मैंतुझे रौंदूंगी।

दोहा-29

पानी केरा बुदबुदा, अस मानसकी जात
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि इंसानकी इच्छाएं एकपानी के बुलबुले केसमान हैं जोपल भर मेंबनती हैं औरपल भर मेंखत्म। जिस दिनआपको सच्चे गुरुके दर्शन होंगेउस दिन येसब मोह मायाऔर सारा अंधकारछिप जायेगा।

दोहा-30

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा कोए

भावार्थ:- चलतीचक्की को देखकरकबीर दास जीके आँसू निकलआते हैं औरवो कहते हैंकि चक्की केपाटों के बीचमें कुछ साबुतनहीं बचता।

दोहा-31

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार

भावार्थ:- मालिनको आते देखकरबगीचे की कलियाँआपस में बातेंकरती हैं किआज मालिन नेफूलों को तोड़लिया और कलहमारी बारी जाएगी। भावार्थात आजआप जवान हैंकल आप भीबूढ़े हो जायेंगे औरएक दिन मिटटीमें मिल जाओगे।आज की कली, कल फूल बनेगी।

दोहा-32

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार

भावार्थ:- तीर्थ करनेसे एक पुण्यमिलता है, लेकिनसंतो की संगतिसे पुण्य मिलतेहैं। और सच्चेगुरु के पालेने से जीवनमें अनेक पुण्यमिल जाते हैं

दोहा-33

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि लोगरोजाना अपने शरीरको साफ़ करतेहैं लेकिन मनको कोई साफ़नहीं करता। जोइंसान अपने मनको भी साफ़करता है वहीसच्चा इंसान कहलानेलायक है।

दोहा-34

प्रेम बारी उपजे, प्रेम हाट बिकाए
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि प्रेमकहीं खेतों मेंनहीं उगता औरनाही प्रेम कहींबाजार में बिकताहै। जिसको प्रेमचाहिए उसे अपनाशीशक्रोध, काम, इच्छा, भयत्यागना होगा।

दोहा-35

जिन घर साधू पुजिये, घर की सेवा नाही
ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि जिसघर में साधुऔर सत्य कीपूजा नहीं होती, उस घर मेंपाप बसता है।ऐसा घर तोमरघट के समानहै जहाँ दिनमें ही भूतप्रेत बसते हैं।

दोहा-36

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय।

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि एकसज्जन पुरुष मेंसूप जैसा गुणहोना चाहिए। जैसेसूप में अनाजके दानों कोअलग कर दियाजाता है वैसेही सज्जन पुरुषको अनावश्यक चीज़ोंको छोड़कर केवलअच्छी बातें हीग्रहण करनी चाहिए।

दोहा-37

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया हेत
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि बीतासमय निकल गया, आपने ना हीकोई परोपकार कियाऔर नाही ईश्वरका ध्यान किया।अब पछताने सेक्या होता है, जब चिड़िया चुगगयी खेत।

दोहा-38

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही
सब अँधियारामिट गया, दीपक देखा माही

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि जबमेरे अंदर अहंकारमैं था, तब मेरे ह्रदयमें हरीईश्वर कावास नहीं था।और अब मेरेह्रदय में हरीईश्वर कावास है तोमैंअहंकार नहीं है। जबसे मैंने गुरुरूपी दीपक कोपाया है तबसे मेरे अंदरका अंधकार खत्महो गया है।

दोहा-39

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल जाए
मीन सदा जल में रहे, धोये बास जाए

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि आपकितना भी नहाधो लीजिए, लेकिनअगर मन साफ़नहीं हुआ तोउसे नहाने काक्या फायदा, जैसेमछली हमेशा पानीमें रहती हैलेकिन फिर भीवो साफ़ नहींहोती, मछली मेंतेज बदबू आतीहै।

दोहा-40

प्रेम पियालाजो पिए, सिस दक्षिणा देय
लोभी शीश दे सके, नाम प्रेम का लेय

भावार्थ:- जिसकोईश्वर प्रेम औरभक्ति का प्रेमपाना है उसेअपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा कोत्यागना होगा। लालची इंसानअपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा तोत्याग नहीं सकतालेकिन प्रेम पानेकी उम्मीद रखताहै।

दोहा-41

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर
जो पर पीर जानही, सो का पीर में पीर

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि जोइंसान दूसरे कीपीड़ा और दुःखको समझता हैवही सज्जन पुरुषहै और जोदूसरे की पीड़ाही ना समझसके ऐसे इंसानहोने से क्याफायदा।

दोहा-42

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि वेलोग अंधे औरमूर्ख हैं जोगुरु की महिमाको नहीं समझपाते। अगर ईश्वरआपसे रूठ गयातो गुरु कासहारा है लेकिनअगर गुरु आपसेरूठ गया तोदुनियां में कहीं आपकासहारा नहीं है।

दोहा-43

कबीर सुता क्या करे, जागी जपे मुरारी
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि तूक्यों हमेशा सोयारहता है, जागकर ईश्वर कीभक्ति कर, नहींतो एक दिनतू लम्बे पैरपसार कर हमेशाके लिए सोजायेगा।

दोहा-44

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय
कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय

भावार्थ:- कबीरदास जी कहतेहैं कि चन्द्रमा भीउतना शीतल नहींहै और हिमबर्फ भीउतना शीतल नहींहोती जितना शीतलसज्जन पुरुष हैं।सज्जन पुरुष मनसे शीतल औरसभी से स्नेहकरने वाले होतेहैं।

दोहा-45

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडितभया कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय